खून खौल गया मेरा तब ,
जब उस रात ,
मेरे कुछ रिश्तेदारों को,
दंगाईयों ने काट डाला ,
उनकी लाश देख में ,
सर पे कफ़न बांध ,
हाथ में नंगी तलवार लिए,
घर से निकल पड़ा,
सोचा सबसे पहले में ,
याकूब के घर जाऊंगा ,
जो घर पे बैठा बिरयानी उडा रहा होगा,
अपनी कौम की जीत में,
खुशियाँ मना रहा होगा,
में भूल गया वो दिन ,
जब गुड्डे गुडिया के खेल में,
हम सारी सारी दोपहर,
सर से गुज़ार दिया करते थे,
कभी चोर - सिपाही का खेल ,
कभी डॉक्टर - डॉक्टर खेला करते थे,
जब याकूब की अम्मी मुझे,
अपने हाथों से सेवई खिलाया करती थी,
मेरे बाबा और उसकी अब्बा की दोस्ती के ,
किस्से सुनाया करती थी,
जब याकूब के अब्बा हमें ,
अपने कंधे पे बैठाकर,
मेला घुमाया करते थे,
कभी डॉक्टर - पुलिस की वर्दी ,
तो कभी धनुष बाण दिलाया करते थे,
याकूब की वोह कलाई भी भूल गया,
जिसपर मेरी बहन राखी बंधा करती थी,
वो ईद भी भूल गया जब ,
याकूब की अम्मी,
हमें ईदी दिया करती थी,
अब में गुस्से में फनफनाता हुआ,
याकूब के घर पहुंचा,
पर उसके घर की हालत देख लगा,
शायद में गलत पते पे आ पहुंचा,
घर की चौखट पे खून पड़ा था,
पूरे घर में अँधेरा पैर पसारे हुए था ,
भीतर वाले कमरे में ,
एक लाश कफ़न में लिपटी पड़ी थी ,
मुंह उघाड कर देखा ,
वो
याकूब की अम्मी थी,
तभी दुसरे कमरे से मुझे ,
उसके अब्बा की आवाज आई ,
मेरे सर से खून उतर गया,
हाथ से तलवार छूट गयी ,
उस कमरे में पहुंचा तो देखा ,
मेरे बाबा उनके सिराहने बैठे हुए थे,
अपने दोस्त की याद में वो बिलख रहे थे,
तभी झट से याकूब मेरे गले लग गया,
तब मेरा सारा गुस्सा पल भर में उतर गया ,
उसको गले लगा कर ,
मुझे सब समझ आ गया ,
यह सब सियासी खेल है,
मेरी समझ में आ गया,
यह सब सियासी खेल है,
मेरी समझ में आ गया
यह सब सियासी खेल है,
मेरी समझ में आ गया
(क) मधुर त्यागी
